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कुछ बात है

By Anand Vardhan Lal


बहुत दिन हुए चैन से सोया नहीं अपने धुंधले से ख़्वाबों में खोया नहीं

कुछ बात है बरफ की इस चादर में कि इस खून ख़राबों में भी मै रोया नहीं

आज ये बन्दूक ही मेरा यार है इन सूखी वादियों से ही मुझे अब प्यार है

कुछ बात है इन मुरझाये हुए फूलों में कि ये शरीर भी सहता हर वार है


पर यहाँ ठण्ड बहुत लगती है ये आग भी थोड़ी सहम के जलती है

हवाओं में एक गूँज की सी है शायद इनपे गोलियों की हुजूरी नहीं चलती है

कुछ बात है इन खून से रंगे चट्टानों की कि शाम के बाद यहाँ चांदनी सी रात नहीं ढलती है


खड़े हैं प्रहरी बनके इस देश के प्रमाण हैं दो भाइयों के उमड़ते हुए क्लेश के

हर साल हम वही गीत गाते हैं कि सरहद के पार भी लोग हमे भाते हैं

कुछ बात है इन खिंची हुई लकीरों में जिसने घरों के आँगन तक भी बांटे हैं


गोलियों की आवाज़ से उठ जाते हैं दिवाली के पटाखों में भी सो जाते हैं

कुछ बात है इस झपकी भरी नींद में कि हँसते हँसते मौत को गले लगा लेते हैं

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About the Author:

Anand Vardhan Lal is from the Batch of 2017–19. He is a prolific writer of Hindi Poetry and had a publication offer from Penguin Publications.

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