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वो दिन !

By Divyank Gupta


अक्सर मुझे वो दिन याद आते हैं

जब एक चेहरे को देख मेरा दिन बना करता था


अक्सर मुझे वो दिन याद आते हैं

जब स्कूल जाने के लिए, माँ के उठने के उठा मैं करता था


अपनी ख़ुशी छुपाने के लिए बहाना कुछ दिया करता था

जब रोज़ उसे बस के शीशे से देखा मैं करता था


वो स्कूल का सफ़र बहुत छोटा सा लगने लगता था

अक्सर मुझे वो दिन याद आते हैं


जब असेंबली में हज़ारों कि भीड़ में उसे खोजा मैं करता था

फिर उसके पास की लाइन में खड़े होने का मन किया करता था


इसलिये टीचर्स कि नज़रों से बचा मैं करता था

और कई बार अपने हाउस को छोड़ उसके हाउस में खड़ा हुआ करता था


अक्सर मुझे वो दिन याद आते हैं

जब शाम होते ही तैयार मैं हुआ करता था

और अपने दोस्त के साथ पार्क जाया मैं करता था


वो तो एक बहाना था, मकसद कुछ और ही हुआ करता था

उसके घर के नीचे से उसकी एक झलक पाया मैं करता था


अक्सर मुझे वो दिन याद आते हैं

मुझे याद है वो खुशबु जो उसके गली के फूलों से आती थी


वो खुशबु मुझे अलग ही दुनिया में ले जाती थी

वो खुशबु अगर कहीं और भी मिल जाती थी

उस पल में उसके पास होने कि ख़ुशी दे जाती थी


अक्सर मुझे वो दिन याद आते हैं

जब छुट्टी का दिन बड़ा बुरा सा मुझे लगता था

क्यूंकि उस दिन उसे देखा मैं कम करता था


नहीं पता था मुझे ये भगवान् की तैय्यारी थी

क्यूंकि आने वाले कुछ साल मुझपे वो मेहर होने नहीं वाली थी


अक्सर मुझे वो दिन याद आते हैं

जब एक चेहरे को देख मेरा दिन बना करता था

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About the Author:

Divyank Gupta is from the batch of 2016–18.

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